आज मसीही समाज मे मसीही लोगो की गिनती लगातार बड रही है,लोग बढ़ते जा रहे है मसीही कहे जाने वाले लोग पूरी दुनिया मे बढ़ते जा रहे है जो एक बहुत अच्छी बात है की प्रभु यीशु मसीह को मानने वाले लोगो की संख्या बड रही है क्योंकि यही एक मात्र सच्चाई का ऐसा रास्ता है जिससे होकर हम उस हमेशा की मीरास के वारिस हो सकते है....
कितनी अच्छी बात है की मसीह को मानने वाले उसके पीछे चलने वाले उसकी अराधना करने वाले लोगो की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है इससे अच्छी और कोई बात नही हो सकती...एक विश्वासी होने के नाते हमारा ये ही काम है की पहले हम खुद बचे फिर ज्यादा से ज्यादा लोगो को बचाये हम सभी मसीही कहलाए जाने वाले लोगो के लिए ये कितनी बड़ी बात है की जो काम यीशु मसीह हमारे लिए छोड़ कर गए थे वो बड़ी तेजी से पूरा हो रहा है....
कितनी ज्यादा ख़ुशी की बात है ये हर एक विश्वासी के लिए मसीही लोग बड़ रहे है हम देखते है आज चर्च में कितनी ज्यादा भीड़ होती है कितने ज्यादा लोग उसकी महिमा करते है जगह नही होती बड़े-बड़े चर्च मे बैठने की क्योंकि बहुत लोग जाते है चर्च कितनी अच्छी बात है.....
यीशु मसीह कितने खुश होते होंगे
ये भीड़ देखकर???
कितना अच्छा लगता होगा की कितने सारे लोग बाप की अराधना उसकी महिमा उसके नाम से कर रहे है, क्या सच में यीशु मसीह ऐसा ही देख कर खुश होते होंगे???
आइये कलाम से देखते है,की वो क्या कहता हैं,यूहत्रा 4:23, में लिखा हैं, यीशु मसीह ने कहा!परन्तु वह समय आता है ,वरन अब भी है, और जिससे सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेगे,क्योंकि पिता अपने लिए ऐसे ही आराधकों को ढूढता है......
यहाँ यीशु मसीह कह रहे है की पिता यानि परमेश्वर अपने लिए आराधक यानि परमेश्वर की महिमा करने वाले लोगो को ढूढ़ रहे है ऐसा क्यों कहा यीशु मसीह ने??? क्यों कि चर्च तो भरे हुए हैं और यीशु मसीह ढूढ़ रहे है
मसीहों की गिनती तो बढ़ती जा रही है दिन प्रतिदिन और यीशु मसीह कह रहे है की परमेश्वर अभी भी आराधकों को ढूढ रहे है आखिर क्यों कहा ऐसा??? वो कौन सी बात है जो मसीह हमे कह रहे है लेकिन हम समझ नही पा रहे है ??? क्या है यह भेद जो यूहत्रा 4:24, में हैं,???
आइये इसे पवित्र आत्मा की सहभागिता से समझते है....
एक ओर हमे दिख और रोज सुनाई दे रहा है, की रोज हम सुनते है की उस भाई से परमेश्वर पर विश्वास ले आया वो बहन विश्वास मे आ गई दूसरी ओर यीशु मसीह का यह कहना की पिता यानि परमेश्वर सच्चे आराधक को ढूढ रहा है कितनी अजीब सी बात है अब इसे हम कैसे समझे????? इसका एक ही जवाब है पवित्र आत्मा से समझे...
मति 22:14 में यीशु मसीह कहते है क्योंकि बुलाए हुए तो बहुत है परन्तु चुने हुए थोड़े है''
मेरे प्यारे भाइयो और बहनो यही भेद यूहत्रा 4:24, का हैं,उसकी यानि परमेश्वर की नजर में हर एक कोई उसके आराधक या उसके पूजने वाले नही है तभी तो इतनी बड़ी मसीहों की भीड़ होने के बावजूद भी परमेश्वर को भक्त ढूढना पड रहा है क्योंकि उसकी नजर में हर एक जन उसका आराधक नही है बल्कि केवल चुने हुए लोग ही उसके आराधक है ये भेद खोलने के लिए पवित्र आत्मा का धनयवाद.....
अब जो सवाल उठता है वह यह है की उसकी नजर में कौन कौन उसके चुने हुए आराधक है ???? और क्या हम उसकी नजर मे उसके चुने हुए आराधक है ??? उसका क्या नजरिया है हमारी भक्ति के प्रति हमारी आराधना के प्रति????....
लूका 18, में प्रभु यीशु मसीह ने एक दृष्तांत दृश्टान्त कहा जिसमे वो दो तरह के लोगो का जिक्र कर रहे है पहला फरीसी यानि दुनिया की नजर में बहुत इज्जतदार और महान इंसान और दूसरा एक चुंगी लेने वाला यानि एक बेकार या दुनिया मे तुछ समजा जाने वाला एक पापी मनुष्य हैं, ये दोनों ही परमेश्वर से अपनी-अपनी दुआ करते है आइये इनकी दुआ को एक-एक करके देखते है ...
आयात 11में फरीसी खड़ा होकर अपने मन मे यो प्रार्थना करने लगा ,हे परमेश्वर में तेरा धनयवाद करता हूँ कि मै दूसरे मनुष्यो के समान अन्धेर करने वाला ,अन्याई और व्यभिचारी नही, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ
आयात 12 में सप्ताह मे दो बार उपवास रखता हूँ , मै अपनी कमाई का दसवाँ अंश भी देता हूँ ।
ये हुई फरीसी की प्रार्थना
अब देखते है चुंगी लेने वाले की प्रार्थना।
आयात 13 में परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर स्वर्ग की और आँखे उठाना भी न चाहा, वरन अपनी छाती पिट-पीटकर कहा हे परमेश्वर ,मुझ पापी पर दया कर।
ये थी दोनों की प्रार्थना हम सब बहुत अच्छे से जानते है की यीशु मसीह ने उस समय चुंगी लेने वाले को धर्मी ठहराया पर क्या हम ये जानते है की मसीह ने ऐसा क्यों किया?? क्या था इसके पीछे का कारण??
आइये जानने की कोशिश करते है....
अगर हम इन दोनों की प्रार्थना को ध्यान से पड़े और उसे समझने की कोशिश करे तो इसमें ऐसी बहुत सी बाते है जिससे दोनों में का अंतर प्रकट होता है...
फरीसी अपनी प्रार्थना में अपने आप को कितना बड़ा धर्मी समझ रहा है वो परमेश्वर को अपने धर्म के काम गिना रहा है वो परमेश्वर का धनयवाद कम और अपनी तारीफ ज्यादा कर रहा है वो ये सोच रहा है की को बहुत बड़ा धर्मी है पर वो कलाम को नही जानता जहाँ रोमियो 3:10, में लिखा है कोई धर्मी नही एक भी नही...और वो फरीसी लगा हुआ है अपने को धर्मी ठहराने में...
और दूसरा यानि चुंगी लेने वाला अपने को इतना बड़ा पापी समज रहा है की वो परमेश्वर की तरफ नजर भी नही मिला पा रहा है और उसने अपने को इतना निचा और तुच्छ कर लिया है की अपनी छाती पिट-पीटकर परमेश्वर से दया की मांग कर रहा है ये अपनी नजर में बहुत बड़ा पापी है
और परमेश्वर भी हमसे यही चाहता है की हम उसके सामने अपने को पापी मानकर अपने को तुच्छ मानकर और अपने को छोटा करके उसके पास आए तभी उसकी नजर में हम धर्मी ठहरेंगे उस फरीसी की तरह नही की परमेश्वर को अपने धर्म के काम गिना रहा जैसा हम सब करते भी है,हमे ऐसा नही करना क्योंकि हमारे धर्म के कम उसके सामने फ़टे पुराने मेले चिथड़े कपडे के समान है जिसका कोई मोल नही होता ऐसे ही परमेश्वर के सामने हमारे धर्म के कामो का कोई मूल्य नही है क्योंकि हमारे धर्म के काम इंसानो को दिखाने के लिए होते है उनको दिखा कर अपनी तारीफ सुनने के लिय हमारे धर्म के काम होते है ....
और हम अपने आप को बड़ा बनाने की कोशिश करते है जो गलती उस फरीसी ने भी करी और बन गया अधर्मी परमेश्वर की नजरो मे हम ऐसा बिल्कुल न करे हम अपने को हमेशा छोटा करे तभी हम उसकी नजरो में बड़े बनेगेे अगर हमे उसकी नजरो मे बड़ा बनना है तो अपने को छोटा करे जैसा यीशु मसीह ने मति मे कहा भी है तुममे से जो बड़ा होना चाहे वो अपने को छोटा कर ले....
अब प्रभु यीशु मसीह ने तो बता दिया पर क्या हम इसे कर पा रहे है हम तो हर चीज को अपने तरीके से देखते है हर चीज को अपनी अक्ल से समझते है हर बात को अपनी अक्ल से जाँचते है पर हम भूल जाते है की हमे ऐसा नही करना चाहिए,क्योकि लिखा हैं, नितिवचन 3:5, में तू अपनी समझ का सहारा न लेना....
कितनी अजीब सी बात है परमेश्वर हमे अपनी अक्ल का सहारा लेने को मना कर रहे है क्यों?आखिर क्यों नही हम अपनी अक्ल का सहारा ले?? हमे ऐसा लगता हैं,अगर हम अपनी अक्ल से नही चलेगे तो इस संसार मे हम कैसे रह सकते है,शायद दुनिया हमें जीने नही देगी पर परमेश्वर की हर एक बात के पीछे उसके हर एक वचन के पीछे कोई न कोई कारण होता है इसके पीछे भी कोई कारण जरूर होगा आइये उस कारण को जानते है....
गलतियो 5:17, क्योंकि शारीर आत्मा के विरोध मे और आत्मा शारीर के विरोध मे लालसा करता है ,और ये एक दूसरे के विरोधी है, इसलिए कि जो तुम करना चाहते हो वह करने न पाओ......
ये है वो कारण जिसके वजह से परमेश्वर का पवित्र कलाम अपनी अक्ल का सहारा लेने से मना कर रहा है क्योंकि इंसानी अक्ल और रूहानी अक्ल में बैर है ये एक दूसरे के विरोधी है ये दोनों ही एक दूसरे के कामो को रोकते है अगर कोई सांसारिक अक्ल से चले तो वह परमेश्वर की मुहरबंद किताब में से कुछ नही समझ सकता और अगर कोई रूहानी अक्ल से या परमेश्वर की अक्ल से चले तो वो कभी शारीरिक रीती से चलने की नही क्योंकि तब वो रूहानी हो जायगे तो आत्मा हर एक शारीरिक काम को दूर करने की कोशिश करेगी ताकि मनुष्य को पूरी तरह आत्मिक कर दे रूहानी कर दे....
इन दोनों में बैर है तभी यह दोनों एक दूसरे के विरुद्ध कार्य करते है इसलिए यह कहा गया है ताकि दोनों एक दूसरे के कामो में रूकावट ला सके तभी लिखा है वचन मे की तू अपनी समझ का सहारा ना लेना क्योंकि जब जब मनुष्य अपनी अक्ल से चलने की कोशिश करेगा तो आत्मा में गिरेगा क्योंकि जैसा हमने ऊपर देखा की इन दोनों का बैर है अगर सहारा लेगा तो शारीर आत्मा का कोई काम नही होने देगा क्योंकि फिर शारीरक चीजे बिच में आ जाएगी .....
यही तो कारण है प्रभु यीशु मसीह का ये कहना की पिता सच्चे अराधाक को ढूढता है क्योंकि आज पुरे विश्व मे बहुत से लोग उसकी महिमा कर तो रहे है लेकिन सब के सब अपनी अपनी अक्ल से उसकी महिमा कर रहे है पर किसी को याद नही रहता की परमेश्वर ने अपनी अक्ल को इस्तेमाल करने के लिए मना करा है लोग पता नही अपने बारे मे क्या क्या सोचते है की हम तो पास्टर है हम तो इतने बड़े बिशप है पर परमेश्वर की नजर मे तो एक सच्चे आराधक भी नही है तभी प्रभु यीशु मसीह ने कहा की तुम्हारी धार्मिकता शास्रियो और फरीसियों से बढ़कर हो क्योंकि वो उनके हालात उनकी धार्मिकता को जनता था ऐसा ही कुछ किस्सा हमने लुक 18 में पड़ा ऐसे लोगो के लिए लिखा है नीतिवचन 30:12, में ऐसे लोग है जो अपनी दृष्टि में शुद्ध है, तोभी उनका मैेल धोया नही है वो फरीसी भी इसी तरह के लोगो में से था...
पर परमेश्वर का आराधक तो वो है जो अपने आप को छोटा करता है निचा करता है ये हमसे होता नही और हम उसके आराधक नही बन पाते क्योकि इसके बिच में हमारी अक्ल आ जाती है कोशिश करते है अपनी अक्ल से कुछ करने की और फिर परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान होकर अपनी ही धार्मिकता बनाने की कोशिश करते है.....
प्रभु यीशु मसीह ने इसके लिए कहा भी मरकुस 7:7-8, में ये व्यर्थ मेरी उपासना करते है ,क्योंकि मनुष्यो की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते है। क्योंकि तुम परमेश्वर की आज्ञा को टालकर मनुष्यो की रीतियों को मानते हो.......
कही जाने-अनजाने में हम भी तो ऐसा ही तो नही कर रहे कही हम भी मनुष्यों की बनाई हुई धार्मिकता पर तो नही चल रहे ??? क्या हम उसके नजर मे उसके आराधक है??? कही हमारी उपासना उसे व्यर्थ तो नही लग रही है ??? हम सोचे की हम केवल बुलाय हुए है या फिर चुने भी हुए है??? हम किसके पीछे चलना चाहते है मनुष्य या फिर परमेश्वर????
लैव्य 11:44, में लिखा है,क्योंकि में तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ ,इस कारण अपने को शुद्ध करके पवित्र बने रहो, क्योंकि मै पवित्र है....
हम सोचे की हम परमेश्वर के लायक है भी या नही?? परमेश्वर तो बहुत-बहुत पवित्र है पर क्या हम जो उसके पूजने वाले है पवित्र है??? क्या हम सच मे इस लायक है की हम अति महिमामय परमेश्वर की तारीफ भी कर सके अपने रोजाना के कामो को देखे तो शायद हम बिल्कुल भी नही है तभी तो परमेश्वर को कहना पड रहा है की पवित्र बनो क्यों?? क्योंकि हमारा परमेश्वर पवित्र है अगर परमेश्वर पवित्र है तो यह बहुत जरुरी है की उसके पूजने वाले भी पवित्र हो...
हम सब पवित्र आत्मा की सहभागिता से अपने को पवित्र बनाने की कोशिश करे क्योंकि हमारा परमेश्वर पवित्र है हम सब अपने आप को परमेश्वर के लायक बनाय हमे पता होना चाहिए की हम किसकी आराधना करते है यशायाह को जब यशायाह 6 में परमेश्वर के दर्शन होंते है तो वो देखता है की कैसे स्वर्गदूत उसकी महिमा कर रहे है उनको परमेश्वर की महिमा करने के लिए सिर्फ एक ही शब्द आ रहा है पवित्र पवित्र और पवित्र जब स्वर्गदूत केवल एक ही शब्द से परमेश्वर की महिमा कर रहे है उनके पास और कोई शब्द भी नही है की वो परमेश्वर की महिमा कर सके और हम तो कितने खुशनसीब और मुबारक लोग है की हम से परमेश्वर सीधे बात कर सकते है उसे कुछ बता सकते है उससे कुछ पूछ सकते है हम परमेश्वर को समझते ही कहा है हम जानते ही नही जिससे हम दुआ कर रहें है वो है कैसा उसका रुतबा क्या है?? वो परमेश्वर इतना महान है की हर एक शब्द उसकी महिमा के लिए छोटा है ये केवल और केवल उस महान परमेश्वर की दया है की उसने हमे अपना बेटा और बेटी कहा है कितनी बड़ी बात है ये हमारे लिए जो अधिकार प्रभु यीशु मसीह को दिया है वो हमे भी दिया है कितनी बड़ी बात है ये अब जब परमेश्वर ने हम पर ये बड़ी दया करी है तो हम अपने को परमेश्वर के लायक करे जेसे आराधकों को परमेश्वर ढूंढ रहा है हम सब वैसे बने हम उसके सच्चे भक्त बने उसकी योग्य संतान बने...
मलाकी में लिखा है की परमेश्वर अपनी योग्य संतान चाहता है तो हम सब परमेश्वर के योग्य संतान बने परमेश्वर हमारी इसमें मदद करे ‛‛आमीन''
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