Sunday, April 30, 2017

"आत्मा या शरीर" "भाग 2"

यूहत्रा 8:23, में प्रभु यीशु मसीह कहते है,उसने उनसे कहा, तुम निचे के हो ,मै ऊपर का हूँ ,तुम संसार के हो ,मै संसार का नही।।

अब हम इस आयत को कैसे समझेंगे?

यहाँ प्रभु यीशु मसीह खुद अपने लिए कह रहे है की मैं संसार का नही और वहा पर जो लोग थे उन्हें कहे रहे है की तुम संसार के हो....

ये हम सब जानते है की प्रभु यीशु मसीह पापमय शारीर की सामनता में घरती पर आय थे और वह चरणी में पैदा हुए संसार में साढ़े 33 साल तक रहे फिर उन्होंने क्रूस को सहा और साढ़े 33 साल उन्होंने घरती पर शारीर में संसार के अंदर ही गुजारे....

इतना समय उन्होंने शारीरिक देह में संसार में गुजारा इस दौरान उन्होंने हर एक शारीरिक जरुरतो को महसूस किया  उन्हें भूख लगी प्यास लगी उनको थकान हुई वह सांसारिक देह में ही थे वह भी किसी आम इंसान की तरह जिसे संसार की अति आवयशक चीजो की आवश्यकता थी जैसे रोटी पानी आराम इत्यादि इन सब अति महत्वपूर्ण चीजो की अति आवश्यकता होने के बावजूद भी प्रभु यीशु मसीह ने इसको कभी प्राथमिकता नही दी....

यही कारण है की प्रभु यीशु मसीह अपने आपको संसार का नही मानते थे क्योंकि उन्होंने कभी भी इन जरुरतो के लिए परिश्रम नही किया जिसके पीछे आज पूरा संसार लगा हुआ है....

यूहत्रा 4:8, में लिखा है,क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गय थे और 31 आयत में लिखा है।   इस बिच उसके चेलो ने यीशु से यह विनती की, हे रब्बी, कुछ खा ले...

यानि ये तो पक्की बात है यीशु मसीह और चेले दोनों ही भूखे थे....

पर प्रभु यीशु मसीह उन्हें उत्तर देते है 34 आयत में, यीशु ने उनसे कहा, मेरा भोजन यह है कि अपने भेजनेवाले की इच्छा के अनुसार चलू और काम पूरा करूँ

प्रभु यीशु मसीह ने खाने जैसी इतनी जरुरी चीज को भी प्राथमिकता नही दी उन्हें उस काम से ज्यादा बाप की इच्छा पूरी करने पर ध्यान था.....

तभी तो प्रभु यीशु मसीह ने कहा की में संसार का नही उन्होंने संसार में रहते हुए भी संसार की परेशानीयो और जरुरतो की तरफ कभी धयान नही दिया क्योंकि वो पृथ्वी पर किसी मकसद से आये थे जिसे पूरा करने पर उनका पूरा ध्यान रहता था

तभी पौलुस लिखते है 2 कुरि 5:16, में,अतःअब से हम किसी को भी शारीर के अनुसार न समझेगे । यधपि हम ने मसीह को भी शारीर के अनुसार जाना था ,तौभी अब से उसको ऐसा नही जानेगे।

उस वक्त सभी प्रभु यीशु मसीह को सभी शारीर से जोड़ते थे की ये तो सामरी है ये तो उसका पुत्र है इसके माता पिता को तो हम जानते है......

ये था नजरिया लोगो का यीशु के प्रति क्योंकि वो शारीर में थे पर उन्होंने कभी भी अपना जीवन शारीर की  लालसाओं के लिए नही जिया जबकि वो भी इंसान ही थे ऐसा इसलिए हुआ क्योंकी वो परमेश्वर की आत्मा के चलाय चलते थे....

अब हमने ये तो जान लिया की प्रभु यीशु मसीह संसार में रह कर भी संसार के नही थे, पर अब सवाल यह उठता है,की हम जो प्रभु यीशु को फोलो करते हैं, हम कहा के है संसार के या आत्मा के द्वारा स्वर्ग के??? हम आज ऊपर के है या निचे के यह फैसला हमे करना है???

प्रभु यीशु मसीह ने यूहत्रा 8:23, में कहा,तुम संसार के हो कही ये बात हमारे लिए भी तो नही है????कही आज हम भी तो सांसारिक नही है????

1कुरि 3:3, में लिखा हैं, क्योंकि अब तक शारीरिक हो। इसलिए कि जब तुम में डाह और झगड़ा है ,तो क्या तुम शारीरिक नही?

वचन तो बताता है की हम शारीरिक है क्योंकि हममे अभी भी शारीरिक चीजे ज्यादा है हममे वो चीजे ज्यादा है जो हमे शारीरिक बनाती है जैसे ऊपर लिखा भी है ‛‛डाह झगडे‘' ऐसी और भी बहुत से चीजे है जिससे हम शारीरिक कहलाते है...

रोमियो8:5, में लिखा हैं, क्योंकि शारीरिक व्यक्ति शारीर की बातो पर मन लगाते है, परन्तु आद्यात्मिक आत्मा की बातो पर मन लगाते है।

यही तो सबसे बड़ा कारण है हमारे शारीरिक होने का क्योंकि हमारा मन ही शारिरिकता पर लगा होता है हमारा ध्यान शरीर पर ही लगा रहता है हमारे लिए शारीर के काम ज्यादा जरुरी होते है,हमारे लिए शारीर की जरुरतो को पूरा करना ज्यादा जरुरी होता है क्या हम नही जानते की मसीह ने कहा की आत्मा तो जीवन दयाक है पर शारीर से कुछ लाभ नही??

अब जिस चीज से हमे लाभ ही नही है तो उसके लिए हम क्यों परिश्रम करते है???यही बात अब्राहम और मूसा जैसे लोगो को पता लग गई थी तभी मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इंकार कर दिया क्योंकी उसे पता लग चूका था की यहाँ की इज्जत या यहाँ की ख़ुशी से कुछ लाभ नही है उसे वहाँ की ख़ुशी का इंतजार था जिसे उसने मसीह के कारण देख लिया था लेकिन हम कहा की ख़ुशी इंतजार कर रहे हैं,????

आगे छटी आयत में लिखा है शारीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है हमे क्या चाहिए हमेशा की मृत्यु या हमेशा की शान्ति???

हमे अपने मन कहा लगाना चाहिये शारीर पर जिसके अनुसार हमे मृत्यु मिलना तय है??? या आत्मा पर जिसको बचाने से ही जीवन शान्ति और हमेशा की मीरास मिल सकती है......

हम अपने आप को मसीह कहलाना चाहते है हम चाहते है की हमारा नाम मसीहों में लिया जाए क्या हम सच में मसीह यीशु के है ??? उसके लायक है??? उसके जैसे है???

गलातियो 5:24,में लिखा हैं, और जो मसीह यीशु के है ,उन्होंने शारीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओ समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है ।

क्या हमने चढ़ाया है अपनी इच्छाओ को अपनी लालसाओं को अपनी अभिलाषा को क्रूस पर चढ़ा दिया??? या फिर हम बिना इसके करे ही मसीह कहलाना चहाते है??? अगर ऐसा है तो हम मसीह नही है क्योंकि कलाम तो ऐसा ही बताता है की जो मसीह के है....

हमे चढ़ाना है अपनी लालसाओं को क्रूस पर अपनी इच्छा और कामनाओ को भी क्रूस पर क्या मैने और आपने यह सब किया है??? क्योंकि हमारी इच्छाये ही हमसे पाप कराती है ये ही हमे शारीरिक और पापी बनाती है ये ही हमे सच्चा मसीही नही कहलाने देती.....

तभी तो पौलुस बड़े भोझ के साथ
कुलु 3:5, में लिखते है, इसलिए अपने उन अंगो को मार डालो जो पृथ्वी पर है, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्ता, दुष्कामना, लालसा और लोभ को जो मूर्तिपूजा के बराबर है, हमारी इच्छा और जरूरत से ही हमारे अंदर ये सब बढ़ता है और हम परमेश्वर और खुदावंद यीशु मसीह के लिए अयोग्य हो जाते है की इन सब अंगो को मार दो इनको मार कर ही हम आत्मिक बन सकते है बिना इसके नही इन सभी चीजो को मारना बहुत जरूरी है

तभी पौलुस लिखते है....

रोमियो 6:12, में लिखा है की      इसलिए पाप तुम्हारे नश्वर शारीर में राज्य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो,

नही करने देना हमे पाप को हमारे शारीर पर राज्य क्योंकि ये ही हमे परमेश्वर से दूर और शैतान से करीब लाता है और हम शारीरक बन जाते है वजाय इसके की हम आत्मिक बने....

रोमियो8:8, में लिखा है, और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नही कर सकते ।।

क्या हम परमेश्वर को प्रसन्न या खुश करना चाहते है??? अगर हा तो हमे शारीरिकता को छोड़ना पड़ेगा या त्यागना पड़ेगा बिलकुल जेसे प्रभु यीशु मसीह ने किया वो शारीरिकता को त्याग कर सिर्फ आत्मा के चलाय चलते थे परमेश्वर करे हम भी आत्मा के चलाय चले...

यीशु मसीह हमारे लिए न कहे की तुम सांसारिक हो इसलिए हम सब आत्मिक बने और शारीर के अनुसार या उसकी लालसाओं के लिए न जिए वरन आत्मा के लिए आत्मा के फल पाने के लिए जिए हमारा सारा परिश्रम आत्मा के लिए हो।

परमेश्वर हमारी सबकी इस वचन को समझने में मदद करे ‛‛आमीन‘‘

No comments:

Post a Comment