Wednesday, April 26, 2017

आत्मा या शरीर

भजन :31,5 में लिखा है, मै अपनी आत्मा को तेरे ही हाथ में सौप देता हूँ ,हे यहोवा, हे सत्यवादी ईश्वर,तू ने मुझे मोल लेकर मुक्त किया है...

राजा दाऊद के द्वारा मसीह का आत्मा पहले ही से इस वचन में कह रहे है जो बात कलवरी की क्रूस से सात कलमो में से एक में कही गई की मैं अपनी आत्मा तेरे हाथ में सौप देता हूँ अब सवाल यह उठता हैं, की राजा दाऊद के द्वारा मसीह ने तो अपनी आत्मा परमेश्वर के हाथो में सौप दी.....

अब सवाल यह उठता है की मैंने और आप ने अब तक अपना क्या सौपा परमेश्वर के हाथो में???

आज हमारा ध्यान कहा पर है आज हमारा ध्यान केवल अपने शारीर पर ही हैं, जोकि नाशवान है,पर आत्मा  जिसको परमेश्वर के पास जाना है उसके विषय में हम सोचते ही नही, की हमे आखिर परमेश्वर को सोपना क्या है, शरीर या आत्मा ????

यूहत्रा :6,63 में लिखा है, आत्मा तो जीवनदायक है ,शरिर से कुछ लाभ नही,जो बाते मेँ ने तुम से कही है वे आत्मा है और जीवन भी है

वचन बताता है की हमे जीवन आत्मा से मिलना है,यहाँ कौन से जीवन की बात हो रही हैं???यहाँ बात हो रही हैं ‛‛अनंत जीवन‘‘ की अनंत जीवन तो हमे अपनी आत्मा को बचा कर ही मिल सकता है और आगे लिखा है शारीर से कुछ लाभ नही कैसे लाभ नही???

क्योंकि शारीर के लिए कुछ भी करना व्यर्थ है क्योंकि इस जीवन का अंत एक दिन तय है पर हमारे अंदर की आत्मा नही मरेगी इसका एक दिन न्याय होना है,जिसकी हम चिन्ता भी नही करते...

न्याय वाले दिन परमेश्वर ये देखेगे की हमने कितना काम अपनी आत्मा के लिए किया वो ये देखेगे की इसका ध्यान कहा रहता था सबकी तरह शारीर की तरफ या फिर आत्मा की तरफ...

हमारी सबसे बड़ी गलती यही है की हम आत्मा की तरफ नही देखते हमारा सारा ध्यान शारीर की तरफ होता हैं,जबकि वो नाशवान है उसका नाश होना तय है और जिसको नाश नही होना उसकी तरफ हमारा ध्यान हैं ही नही...

और लगे हुए है अपने शारीर की इच्छाओ को पूरा करने में हम ऐसी इच्छाओ को पूरा करने की कोशिश करते है जो कभी पूरी नही हो सकती इच्छाये कभी ख़तम और पूरी नही हो सकती क्योंकि इसके लिए जितना भी करो वो कम है जितना इसको पूरा करो उतना ही ये बढेगी और हम फिर भी इसी के पीछे लगे हुए है इसकी पूर्ति जो कभी नही हो सकती हम इसे पूरा करना चाहते है...

सभोपदेशक :2,22,में लिखा हैं, मनुष्य जो धरती पर मन लगाकर परीश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है???

कभी हमने सोचा है की जो आज हम सब कुछ शारीर के लिए कर रहे है उससे हमे क्या लाभ होगा एक दिन उन सारे परीश्रम का फल कोई और खायगा और हम फिर भी इसी के लिए सब करना चाहते है

तभी प्रभु यीशु मसीह ने कहा की नाशवान भोजन के लिए परिश्रम मत करो पर हम तो इसके लिए ही करते है उसकी बहुतायत हमारे लिए जरुरी है.......

यीशु मसीह ने कहा की उससे मत डरो जो शारीर को घात कर सकते है बल्कि उससे डरो जो आत्मा को घात कर सकते है....

क्यों डरे हम आत्मा के घात करने वाले से हमारा तो सारा ध्यान शारीर पर है आत्मा से हमे क्या लेना????

रोमियो :8,5 में लिखा हैं,क्योंकि शारीरिक व्यक्ति शारीर की बातो पर मन लगाते है परन्तु आध्यात्मिक व्यक्ति आत्मा की बातो पर मन लगाते है

हम सब अपने आप को जाँचे की हमारा मन आज कहा लगा हुआ है शारीर की तरफ या फिर आत्मा की तरफ???

प्रभु यीशु मसीह ने तो अपनी आत्मा परमेश्वर के हाथ में सौप दी क्योंकि वहा से उसे कोई नुकसान नही पहुचा सकता है जैसा प्रभु यीशु मसीह ने कहा था की उससे डरो जो आत्मा को घात पहुँचा सकते है अगर हम भी परमेश्वर के बड़े और सामर्थी हाथो में अपनी सबसे बहुमूल्य चीज आत्मा को सौपते है तो फिर परमेश्वर हमारी आत्मा की रक्षा करेगा....

हम सब सोचे की हमे क्या सौपना है परमेश्वर के हाथो में???

परमेश्वर हमारी इसमें मदद करे और अगुवाई भी परमेश्वर का अनुग्रह हम सब पर हो आमीन।

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