Sunday, April 30, 2017

"आत्मा या शरीर" "भाग 2"

यूहत्रा 8:23, में प्रभु यीशु मसीह कहते है,उसने उनसे कहा, तुम निचे के हो ,मै ऊपर का हूँ ,तुम संसार के हो ,मै संसार का नही।।

अब हम इस आयत को कैसे समझेंगे?

यहाँ प्रभु यीशु मसीह खुद अपने लिए कह रहे है की मैं संसार का नही और वहा पर जो लोग थे उन्हें कहे रहे है की तुम संसार के हो....

ये हम सब जानते है की प्रभु यीशु मसीह पापमय शारीर की सामनता में घरती पर आय थे और वह चरणी में पैदा हुए संसार में साढ़े 33 साल तक रहे फिर उन्होंने क्रूस को सहा और साढ़े 33 साल उन्होंने घरती पर शारीर में संसार के अंदर ही गुजारे....

इतना समय उन्होंने शारीरिक देह में संसार में गुजारा इस दौरान उन्होंने हर एक शारीरिक जरुरतो को महसूस किया  उन्हें भूख लगी प्यास लगी उनको थकान हुई वह सांसारिक देह में ही थे वह भी किसी आम इंसान की तरह जिसे संसार की अति आवयशक चीजो की आवश्यकता थी जैसे रोटी पानी आराम इत्यादि इन सब अति महत्वपूर्ण चीजो की अति आवश्यकता होने के बावजूद भी प्रभु यीशु मसीह ने इसको कभी प्राथमिकता नही दी....

यही कारण है की प्रभु यीशु मसीह अपने आपको संसार का नही मानते थे क्योंकि उन्होंने कभी भी इन जरुरतो के लिए परिश्रम नही किया जिसके पीछे आज पूरा संसार लगा हुआ है....

यूहत्रा 4:8, में लिखा है,क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गय थे और 31 आयत में लिखा है।   इस बिच उसके चेलो ने यीशु से यह विनती की, हे रब्बी, कुछ खा ले...

यानि ये तो पक्की बात है यीशु मसीह और चेले दोनों ही भूखे थे....

पर प्रभु यीशु मसीह उन्हें उत्तर देते है 34 आयत में, यीशु ने उनसे कहा, मेरा भोजन यह है कि अपने भेजनेवाले की इच्छा के अनुसार चलू और काम पूरा करूँ

प्रभु यीशु मसीह ने खाने जैसी इतनी जरुरी चीज को भी प्राथमिकता नही दी उन्हें उस काम से ज्यादा बाप की इच्छा पूरी करने पर ध्यान था.....

तभी तो प्रभु यीशु मसीह ने कहा की में संसार का नही उन्होंने संसार में रहते हुए भी संसार की परेशानीयो और जरुरतो की तरफ कभी धयान नही दिया क्योंकि वो पृथ्वी पर किसी मकसद से आये थे जिसे पूरा करने पर उनका पूरा ध्यान रहता था

तभी पौलुस लिखते है 2 कुरि 5:16, में,अतःअब से हम किसी को भी शारीर के अनुसार न समझेगे । यधपि हम ने मसीह को भी शारीर के अनुसार जाना था ,तौभी अब से उसको ऐसा नही जानेगे।

उस वक्त सभी प्रभु यीशु मसीह को सभी शारीर से जोड़ते थे की ये तो सामरी है ये तो उसका पुत्र है इसके माता पिता को तो हम जानते है......

ये था नजरिया लोगो का यीशु के प्रति क्योंकि वो शारीर में थे पर उन्होंने कभी भी अपना जीवन शारीर की  लालसाओं के लिए नही जिया जबकि वो भी इंसान ही थे ऐसा इसलिए हुआ क्योंकी वो परमेश्वर की आत्मा के चलाय चलते थे....

अब हमने ये तो जान लिया की प्रभु यीशु मसीह संसार में रह कर भी संसार के नही थे, पर अब सवाल यह उठता है,की हम जो प्रभु यीशु को फोलो करते हैं, हम कहा के है संसार के या आत्मा के द्वारा स्वर्ग के??? हम आज ऊपर के है या निचे के यह फैसला हमे करना है???

प्रभु यीशु मसीह ने यूहत्रा 8:23, में कहा,तुम संसार के हो कही ये बात हमारे लिए भी तो नही है????कही आज हम भी तो सांसारिक नही है????

1कुरि 3:3, में लिखा हैं, क्योंकि अब तक शारीरिक हो। इसलिए कि जब तुम में डाह और झगड़ा है ,तो क्या तुम शारीरिक नही?

वचन तो बताता है की हम शारीरिक है क्योंकि हममे अभी भी शारीरिक चीजे ज्यादा है हममे वो चीजे ज्यादा है जो हमे शारीरिक बनाती है जैसे ऊपर लिखा भी है ‛‛डाह झगडे‘' ऐसी और भी बहुत से चीजे है जिससे हम शारीरिक कहलाते है...

रोमियो8:5, में लिखा हैं, क्योंकि शारीरिक व्यक्ति शारीर की बातो पर मन लगाते है, परन्तु आद्यात्मिक आत्मा की बातो पर मन लगाते है।

यही तो सबसे बड़ा कारण है हमारे शारीरिक होने का क्योंकि हमारा मन ही शारिरिकता पर लगा होता है हमारा ध्यान शरीर पर ही लगा रहता है हमारे लिए शारीर के काम ज्यादा जरुरी होते है,हमारे लिए शारीर की जरुरतो को पूरा करना ज्यादा जरुरी होता है क्या हम नही जानते की मसीह ने कहा की आत्मा तो जीवन दयाक है पर शारीर से कुछ लाभ नही??

अब जिस चीज से हमे लाभ ही नही है तो उसके लिए हम क्यों परिश्रम करते है???यही बात अब्राहम और मूसा जैसे लोगो को पता लग गई थी तभी मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इंकार कर दिया क्योंकी उसे पता लग चूका था की यहाँ की इज्जत या यहाँ की ख़ुशी से कुछ लाभ नही है उसे वहाँ की ख़ुशी का इंतजार था जिसे उसने मसीह के कारण देख लिया था लेकिन हम कहा की ख़ुशी इंतजार कर रहे हैं,????

आगे छटी आयत में लिखा है शारीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है हमे क्या चाहिए हमेशा की मृत्यु या हमेशा की शान्ति???

हमे अपने मन कहा लगाना चाहिये शारीर पर जिसके अनुसार हमे मृत्यु मिलना तय है??? या आत्मा पर जिसको बचाने से ही जीवन शान्ति और हमेशा की मीरास मिल सकती है......

हम अपने आप को मसीह कहलाना चाहते है हम चाहते है की हमारा नाम मसीहों में लिया जाए क्या हम सच में मसीह यीशु के है ??? उसके लायक है??? उसके जैसे है???

गलातियो 5:24,में लिखा हैं, और जो मसीह यीशु के है ,उन्होंने शारीर को उसकी लालसाओं और अभिलाषाओ समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है ।

क्या हमने चढ़ाया है अपनी इच्छाओ को अपनी लालसाओं को अपनी अभिलाषा को क्रूस पर चढ़ा दिया??? या फिर हम बिना इसके करे ही मसीह कहलाना चहाते है??? अगर ऐसा है तो हम मसीह नही है क्योंकि कलाम तो ऐसा ही बताता है की जो मसीह के है....

हमे चढ़ाना है अपनी लालसाओं को क्रूस पर अपनी इच्छा और कामनाओ को भी क्रूस पर क्या मैने और आपने यह सब किया है??? क्योंकि हमारी इच्छाये ही हमसे पाप कराती है ये ही हमे शारीरिक और पापी बनाती है ये ही हमे सच्चा मसीही नही कहलाने देती.....

तभी तो पौलुस बड़े भोझ के साथ
कुलु 3:5, में लिखते है, इसलिए अपने उन अंगो को मार डालो जो पृथ्वी पर है, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्ता, दुष्कामना, लालसा और लोभ को जो मूर्तिपूजा के बराबर है, हमारी इच्छा और जरूरत से ही हमारे अंदर ये सब बढ़ता है और हम परमेश्वर और खुदावंद यीशु मसीह के लिए अयोग्य हो जाते है की इन सब अंगो को मार दो इनको मार कर ही हम आत्मिक बन सकते है बिना इसके नही इन सभी चीजो को मारना बहुत जरूरी है

तभी पौलुस लिखते है....

रोमियो 6:12, में लिखा है की      इसलिए पाप तुम्हारे नश्वर शारीर में राज्य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो,

नही करने देना हमे पाप को हमारे शारीर पर राज्य क्योंकि ये ही हमे परमेश्वर से दूर और शैतान से करीब लाता है और हम शारीरक बन जाते है वजाय इसके की हम आत्मिक बने....

रोमियो8:8, में लिखा है, और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नही कर सकते ।।

क्या हम परमेश्वर को प्रसन्न या खुश करना चाहते है??? अगर हा तो हमे शारीरिकता को छोड़ना पड़ेगा या त्यागना पड़ेगा बिलकुल जेसे प्रभु यीशु मसीह ने किया वो शारीरिकता को त्याग कर सिर्फ आत्मा के चलाय चलते थे परमेश्वर करे हम भी आत्मा के चलाय चले...

यीशु मसीह हमारे लिए न कहे की तुम सांसारिक हो इसलिए हम सब आत्मिक बने और शारीर के अनुसार या उसकी लालसाओं के लिए न जिए वरन आत्मा के लिए आत्मा के फल पाने के लिए जिए हमारा सारा परिश्रम आत्मा के लिए हो।

परमेश्वर हमारी सबकी इस वचन को समझने में मदद करे ‛‛आमीन‘‘

Wednesday, April 26, 2017

"धर्मी लोग"


भजनकार अपने भजन 92:12, मे कह रहे हैं, धर्मी लोग खजूर (🌴 PALM) के समान होगें,और लबालोन के देवदार के समान बढ़ते रहेंगे।।।।..

कौन सिर्फ और सिर्फ धर्मी लोगो की बात हो रही हैं....??

ऐसा मैं नहीं कह रहा परमेश्वर का जीवित वचन कह रहा है,यहाँ एक सवाल हैं....?

क्या हम धर्मी हैं,?

क्या हम फल और फूल रहे हैं,परमेश्वर के अनुग्रह में जैसा वचन कह रहा हैं, ..?शायद नहीं वजह हम परमेश्वर का वचन ध्यान से न तो पड़ते हैं,न समझते हैं।

पवित्र बाइबिल कहती हैं,रोमियो 3:10 में "कोई धर्मी नहीं एक भी नहीं।

अभी कुछ दिनों के बाद एक विशाल भीड़ निकलेगी जलूस की शक्ल में दिलो में एक दूसरे कें लिए मैल लिए हुए, छल और कपट लिए हुए शायद खजूर की डालियाँ भी लिए हुए...... और कह रही होंगी होशन्ना होशन्ना Palm sunday यानि ख़जूर के इतवार पर....

पवित्र बाईबल भी चार बड़ी भीड़ो का जिक्र करती है? देखे हम कौन सी भीड़ में होंगे?

पहली भीड़ 1..यहून्ना 6 में करीब 5000 की भीड़ थी, जो सिर्फ खाने के लिए थी.....

दूसरी भीड़ 2..यहून्ना 12 मे खजूर की डालियाँ लिए हुए होशाना के नारे लगाते हुए.....

तीसरी भीड़ 3..मरकुस 15 मे एक बड़ी भीड़ चीख चीख के कह रही थी, इसे क्रूस दो, इसे क्रूस दो..

4..चौथी और आखिरी भीड़ प्राकाशितवाक्य 7 में हैं, जो धर्मियो की हैं, उन्होंने भी हाथ में खजूर की डालियाँ ली हुई हैं, लेकिन उन्होंने अपने वस्त्र परमेश्वर के पुत्र के लहू से धो कर शुद्ध कर लिये हैं, और वो भी कह रहे हैं, होशाना!होशाना!होशाना!

हम कौन सी भीड़ मे रहेंगे!आज यह एक गंभीर सवाल हैं?... क्योकि वचन तो बता रहा हैं, धर्मी लोगा खजूर (🌴 PALM) के समान होगें,

जिस दिन हम बड़ी भीड़ लेकर निकलेंगे उस दिन यीशु ने क्या किया था कोई जानता हैं,..? शायद नही लेकिन पवित्र आत्मा बतायेगा... उस दिन प्रभु यीशु ने कहा...

लूका 19:41-42, में पढे तो वहा लिखा हैं,...जब वह निकट आया तो नगर को देख कर उस पर "रोया" और कहा, " क्या ही भला होता कि तू, हाँ तू ही, इसी दिन में कुशल की बातें जानता, परन्तु अब वे तेरी आँखों से छुप गई।.....

क्यों की प्रभु यीशु जानते थे के जब तक प्रभु यीशु उन के बीच थे तब तक तो वह प्रभु यीशु को जान नहीं पाए थे और अब वह घड़ी आने वाली थी जब प्रभु यीशु को क्रूस पे जाना था,मेरे और आप के लिए तभी यीशु उन से यह कह रहे थे और रो भी रहे थे,आज हमारी हालत उन दिनों से कही बत्तर हैं।

क्यों की उस समय उन लोगों की आँखों से उद्धार की बातें छिप गई थी, आज हमारी आँखों से छिप गई हैं, जिस दिन हम जलूस लेकर निकलेंगे  उस दिन हमें अपनी पूरी कौम के लिए अपने घुटनो पर बैठ कर रोना चाहिये अपनी क़ौम के लिए दुआएँ करनी चाहिये वजह वक्त बहुत नज़दीक हैं,........

प्रभु का अनुग्रह हम सब पर हो और हम उस दिन के मकसद को हम सब जाने अभी समय हैं, बाइबिल क्या कहती हैं यह हमें केवल पवित्र आत्मा ही बताएगा,के उस दिन वहाँ भीड़ क्यों जमा थी?हम जो भी करे समझ के साथ करे, प्रभु हम सब को आषिश दें....

अपनी अक्ल, समझ,और बुद्धि दे, ताकि हम परमेश्वर के वचन के मुताबिक चले आमीन....

उस दिन भीड़ वहाँ क्यों जमा थी इसे हम फिर समझ लेंगे।आप सब मेरे लिए दुआ करना।

परमेश्वर के वायदे

जो मसीह भाई बहिन परमेश्वर के प्रति प्रेम रखते हैं,और साथ ही बाइबिल में रूचि भी रखते हैं,वह जानते होंगे की परमेश्वर ने अपने लोगो से 32500  वायदे किये हैं......

यानि किसी भी विश्वासी भाई बहिन का जीवन इस संसार में कम हो सकता हैं, पर परमेश्वर के किये वायदे उनके जीवन में कभी खत्म नहीं हो सकते कितना महान परमेश्वर हैं,

परमेश्वर हमारी सभी बातों का जवाब  देते है और साथ ही अपने बेटे के साथ हमेशा हमेशा के लिए हममे और हमारे साथ रहना चाहते है....

आइये आज कुछ वादों की तरफ ध्यान करे।

यीशु ने कहा लूका 18:27,में, जो मनुष्य से नहीं हो सकता, वह परमेश्वर से हो सकता है।

ऐसा क्या हैं,जो मनुष्य से तो नहीं हो सकता वह परमेश्वर से हो सकता है।

आइये देखे, पवित्र बाइबिल में परमेश्वर ने जब अपने बेटे हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह को तीसरे दिन मुर्दो में से जिलाया तो क्या वो हमें नहीं जिलायेगा? जो उसके बेटे पर विश्वास करते हैं, मसीहों का यही सबसे बड़ा विश्वास हैं, की यह काम केवल परमेश्वर ही कर सकते है, यह काम कोई इंसान नहीं कर सकता और हम इसी बात पर पूरा विश्वास भी करते हैं।आमीन

अफ़सोस तब होता हैं जब हमारे किसी अजीज के चले जाने से हम रोते हैं परेशान होते हैं,यह समय होता हैं की जब हम अपने परमेश्वर के द्वारा किये हुए वायदों पर विश्वास करे की जैसे परमेश्वर ने अपने बेटे को जिलाया वैसे ही एक दिन हमारे अजीज को भी हमसे मिलाएगा.... हलेलुइय्या....

हममे से कितने इस वायदे पर विश्वास करते हैं...?यह हमें अपने अंदर महसूस करना हैं।

अक्सर हम अपने जीवन में ऐसा महसूस करते हैं, की हम ज़िन्दगी में बहुत थक गए हैं,

लेकिन हमारा प्रभु यीशु मसीह कहता है मैं तुम्हे विश्राम दूंगा.....

मत्ती 11:28,में लिखा हैं,हे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा।

आज कितने ऐसे मसीह भाई बहिन हैं जो अपने बोझ को लेकर प्रभु यीशु मसीह के पास इस विश्वास से जाते हैं कि जिसने हमारे पापो का बोझ क्रूस से उठा लिया वह हमारी ज़िन्दगी की हर परेशानी का बोझ भी उठा सकता हैं पर शर्त यह हैं की हम उसके पास जाये तो सही.....

अक्सर ज़िन्दगी के एक मोड़ पे हमें ऐसा लगता हैं बस अब हम एक कदम भी आगे नहीं चल सकते यह पहाड़ से जीवन का रास्ता कैसे काटेगा..?बस और नहीं, एक कदम भी नहीं, हम और आगे बढ़ सकते....

लेकिन हमारा परमेश्वर कहता है 2 कुरिन्थियों 12:9,में लिखा हैं, और उस ने मुझ से कहा, मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ निर्बलता में सिद्ध होती है; इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा, कि मसीह की सामर्थ मुझ पर छाया करती रहे।

क्या हम पर भी उसकी छाया वास करती हैं, क्या परमेश्वर हम से भी यह नही कहता की मेरा अनुग्रह मेरे बच्चो तुम्हारे लिए काफी है,पर हम उसकी आवाज को सुन नहीं पाते हम उसकी आवाज को सुने तो सही।

अक्सर हम मार्था की तरह अपने दुनियाबी कामो के लिए हमेशा चिंतित और परेशान रहते हैं,

बाइबिल बताती हैं,1 पतरस 5:7,में लिखा हैं,और अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है।

क्या हमने कभी अपनी चिंताएं उस पर डाली नहीं हम खुद उन्हें सुलझाने में लगे रहते हैं,और भी इलझते जाते हैं,फिर कहते हैं,परमेश्वर हमारी नही सुनता,हमारा प्रभु यीशु बोलता है अपनी चिंता मुझे दे दो,अब तक नहीं दी पर यदि आज समझ आया हैं तो आज से ही दे दो और फिर देखो उसे हमारी चिंता हैं कि नहीं?

अक्सर जीवन में कुछ अनजाने में हुए हादसों को लेकर हम यह कहते हैं,की मैं अपने आप को माफ़ नही कर पाउँगा....

बाइबिल बताती हैं,1 यूहन्ना 1:9,में लिखा हैं,यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे सारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।

क्या कभी हमने ऐसा करने की कोशिश की शायद नहीं,कोई बात नहीं अब तक नहीं की अब भी कर सकते हैं,.....

ज़िन्दगी में कुछ काम जल्द बाजी मे शुरू कर लेते हैं,बिना प्रार्थना बिना परमेश्वर की इच्छा के और फिर एक दिन हमको लगता हैं,हम इसे पूरा नही कर सकते..?

परमेश्वर का वचन बताता हैं फिलिपियों  4:19,में लिखा हैं,और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। आमीन

लिखा हैं,हर एक घटी को सिर्फ और सिर्फ अपने परमेश्वर के पास आओ तो सही...

जब हम खुद अपनी ही युक्तियों में फस जाते हैं, तब हमें ऐसा महसूस होता की हम इस दुनिया के मुकाबले ज्यादा समझदार नही हैं,

परमेश्वर का वचन कहता हैं,
1 कुरिन्थियों 1:30,में लिखा हैं,
परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा...

यीशु को हम सही तरह समझ ही नहीं पाते तो ज्ञान और समझ और बुद्धि हमे कहा से मिले।

याक़ूब 1:5, में लिखा हैं, पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलहाना दिए सबको उदारता से देता हैं,और उसको दी जायेगी।

क्या हमने कभी परमेश्वर से बुद्धि माँगी शायद माँगने की लिस्ट में गाड़ी, बगला, अच्छा घर, वगैरा वगैरा तो हैं पर उस लिस्ट में बुद्धि नहीं हम चाहे तो आज माँगे जो हमें बिना उलहाना दिए उदारता से देता हैं,

अक्सर ज़िन्दगी में हमारे रिश्ते एक  ऐसे नाज़ुक मोड़ पर पहुत जाते हैं, जिनमे हम कहते हैं,अब मैं अकेला ही रह गया हूँ और कोई मुझे प्यार नही करता.....

लेकिन हमारा परमेश्वर कहता है मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा और न तुम्हे त्यागूँगा....

इब्रानियों 13:5,में लिखा हैं, तुम्हारा स्वभाव लोभरिहत हो, और जो तुम्हारे पास है, उसी पर संतोष किया करो; क्योंकि उस ने आप ही कहा है, कि मैं तुझे कभी न छोडूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा।

पहली बात हमारा स्वभाव लोभरिहत हो,तो फिर उसका किया हुआ वायदा अपने जीवन में देखो की पूरा होता हैं कि नहीं???

भजन सहित में लिखा हैं,परख कर देख यहोवा कितना भला है, हम अपने जीवित और सामर्थ्य से भरे परमेश्वर को परखे भी और जांचे भी क्योकि हमारा परमेश्वर इंसान नहीं जो अपने वायदे से मुकर जायेंगे।

क्यों की बाइबिल में लिखा हैं परमेश्वर इंसान नहीं जो कह कर मुकर जाये।

हम इन में से एक भी वायदे को अपने जीवन में आजमा कर देख ले अगर आपकी ज़िन्दगी में पूरा न हो तो मैं आपका भाई परमेश्वर का गुनेगार हूँगा। मैं जानता हूँ परमेश्वर अपने लोगो की बात को गिरने नहीं देता।आमीन

प्रभु आप सबको आशीष और बरकतों से मालामाल करे।सबसे पहले रूहानी फिर जिस्मानी आमीन।

परमेश्वर का घर

भजनसंहिता:127-1 में लिखा है,  यदि घर को यहोवा न बनाए तो बनाने वाले का परिश्रम व्यर्थ है।  

क्यू व्यर्थ है,????और किस घर की बात हो रही है यह????

क्या वो जिसमे हम रहते है???? शायद नहीं.....

फिर किसकी बात हो रही है यहाँ ?

आइए देखते है:-

मति:7:24,में लिखा हैं, इसलिए जो कोई मेरी ये बाते सुनकर उसे मानता है, वह उस बुद्धिमान मनुष्य के सामान ठहरेगा जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया हैं,

यहाँ भी एक घर की बात हो रही है कौन है ये घर ??? यह घर और कोई और नही बल्की में और आप है,

क्योंकि 1 कुरि:3-16, में लिखा है  क्या तुम नही जानते हो,की तुम परमेश्वर का मंदिर हो,और परमेश्वर का आत्मा तुम में वास करता है

हम उसका मन्दिर और उसके रहने का स्थान है वो हममे रहना चाहता है वो तो हमारे इस घर में रहना चाहता है लेकिन हम उसे अंदर आने ही नही देते आखिर क्यों?

हम कैसे नही आने देते उसे अपने अंदर???हम तो उससे बहुत प्यार करते है हम क्यों मना करेगे उसे अपने अंदर आने से???? हम तो चाहते है उसे उसे अपने अंदर बुलाना 
लेकिन वो क्यों नही आता हमारे अंदर???? आइये देखे:-

लैव्य11:44,में लिखा हैं, क्योंकि में तुम्हारा परमेश्वर हूँ, इस कारण अपने आप को शुद्ध करके पवित्र बने रहो क्योंकि मै पवित्र हूँ.....
अब जो पवित्र है तो उसके रहने की जगह भी पवित्र ही होगी चाहिए।
अब हमे ये तो पता है की परमेश्वर पवित्र है पर शायद हमे ये नही पता की वो आता भी केवल पवित्र जन के पास है वो रहता भी केवल पवित्र जनो में है अब जब तक हम पवित्र नही बनेगे तो उसका आत्मा हममे कैसे रुकेगा...?

क्योंकि हम तो भरे पड़े है गंदगी से गुनाहो से पाप से ऐसा मैं नही बल्कि परमेश्वर का पवित्र वचन कह रहा है

गलातियो:5-19,के मुताबिक शरीर के काम तो प्रकट है,अर्थात व्याभिचार, गंदे काम ,लुचपन,मूर्तिपूजा,टोना बैर, झगड़ा,ईष्या,क्रोध ,विरोद,फूट,विधर्म,डाह,मतवालापन, लीलाक्रीड़ा,और इसके जैसे और-और काम है,

ये है वो सारी लिस्ट जिससे वो हमारे अन्दर नही रह पाता क्योंकि हमारे अंदर पहले से ही इतना सब कुछ भरा हुआ है फिर परमेश्वर के लिए जगह कहा बचती है सारी जगह तो ये सब घेर लेते है हमारे घर की फिर परमेश्वर क्या करे ???

परमेश्वर ने जो करना था वो उन्होंने कर दिया है रोमियो में लिखा है की उसने अपने पुत्र को पापमय शरीर की  समानता में और पापबलि होने के लिए भेजकर , शारीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी....

मसीह हमारे लिए पापमय शारीर की समानता में आकर कुर्बान हो चूका है बाप ने उसे हमारे लिए कुर्बान किया है ताकि उस पर विश्वास करने वाला उद्धार पाये....

प्रभु यीशु मसीह ने एक बात कही की जब तक मनुष्य नए सिरे से न जन्मे वो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नही कर सकता यह बहूत जरुरी है की मनुष्य का एक बार नए सिरे से जन्म लेना जरूरी हैं,क्योंकि जब तक हम नए सिरे से जन्म ना लेगे तब तक हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नही कर सकते और नए सिरे से लेने का मतलब ऊपर लिखी हर बात का त्याग ये ही हैं सारी बाते जो परमेश्वर को हमारे घर में नही रहने देती तभी तो वो हम से दूर रहता हैं,

और जब ये बाते दूर होगी तभी परमेश्वर घर में रहेगा क्योंकि पवित्र वस्तु पवित्र जगह पर ही रहती हैं।

मति:8-24 में लिखा हैं,आखिरी कुछ शब्दो में की जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया ......

कौन है ऐ चट्टान ये और कोई नही यीशु मसीह ही है....

जैसा लिखा है 1 कुरि10:4 में,👍  और सब ने एक ही आत्मिक जल पिया, क्योंकि वे उस आत्मिक चट्टान से पीते थे जो उनके साथ-साथ चलती थी, और वह चट्टान मसीह था  हल्लेलुईया.....

अगर हमारी नीव इस चट्टान पे डली हो तो हम बुद्धििमान कहलाएगे और यह घर फिर गिरने का भी नही।

नीतिवचन 24:3, में लिखा है, घर  बुद्धि से बनता है ,और समझ के द्वारा स्थिर होता है....

पर अफ़सोस हमारा घर मसीह जो बुद्धि है से नही बनता पर हमारा घर तो अशुद्ध वस्तुओ से भरा रहता है

लैव्य 14:35, में लिखा है, तो जिसका वह घर हो वह आकर याजक को बता दे की मुझे ऐसा दिखाई पड़ता है की घर में मानो कोई व्याधि है

आज हमारे घर मे भी बहुत सी व्याधि है यानि बहुत अशुद्ध वस्तुए है  तभी तो परमेश्वर कह रहे है, लैव्य 14:42, में और उन पत्थरो के स्थान में और दूसरे पत्थर लेकर लगाए और याजक ताजा गारा लेकर घर की जुड़ाई करे   

हमे भी अपने घर में से बहुत सारे  पत्थर निकाल कर नए पत्थर लगाने है हमे निकालने है बुराई के पत्थर पापो के पत्थर बुरी सोच के पत्थर  और डालने है अच्छाई के पत्थर सही कामो के पत्थर प्रेम के पत्थर दया के पत्थर......

पर ध्यान रहे ये काम हमे बहुत सोच समझ कर करना है....

क्योंकि लिखा है
निर्ग:20-25 और यदि तुम मेरे लिए पत्थरों की वेदी बनाओ,तो तराशे हुए पत्थरों से ने बनाना ,क्योंकि जहा तुम ने उस पर अपना हथियार लगाया वहाँ तुम उसे अशुद्ध कर दोगो,याद रखे इस घर को बनाते समय हम अपने हथियार यानि अपनी अकल  या समझ नही लगाये वर्ना ये घर अशुद्ध  या गन्दा हो सकता है फिर परमेश्वर उसमे नही रहेगे....

1 राजाओ:6-7 में लिखा हैं,बनाते समय भवन ऐसे पत्थरों का बनाया गया, जो वहाँ ले आने से पहले गढकर ठीक किये गए थे , और भवन के बनते समय हाथौडे बसूली या और किसी प्रकार के लोहे के औजार का शब्द कभी सुनाई नही पड़ा .....

जब वो अपने रहने ले लिए घर बनाता है तो उसमे इंसानी अकल नही रहती  फिर उसमे किसी भी प्रकार के औजारो की यानि इंसानी अकल नही होती सिर्फ आसमानी अकल  होती है जो परमेश्वर की ओर से आती है

और इसके लिए हमे वो आदमी चाहिए जो हर काम का जानकर और हर काम में निपुण हो वो और कोई नही प्रभु यीशु मसीह है

जिसकी माँग राजा सुलेमान भी करते है जब परमेश्वर ने सुलेमान को वो निपुण आदमी दिया तो हमारा घर बनाने के लिए हमे वो निपुण आदमी क्यों नही देगे ? जरूर देगे.....

लेकिन इसके लिए हमे अपने आपको पवित्र करना होगा और अपने घर में अपनी अक्ल को ख़त्म करना होगा तभी ये घर परमेश्वर के रहने लायक हो पायेगा  

खुदा हमारी मदद करे और हमारा घर उसके रहने लायक बन पाये
परमेश्वर हमारी इसमें मदद करे  आमीन....